Thursday, 3 January 2013

ख्वाहिशें

नए साल के ख़ुशी में कुछ गीत  लिखना चाहता हूँ
कुछ दिलों में अरमां हैं पूरा करना चाहता हूँ 


भुत में जो दिल रोया सवालों के जवाबो के लिए
  उन  सवालों का  जवाब पाना चाहता हूँ 


बहुत जिया रो रो  कर इस महफ़िल में
अब हंस हंस कर जीना चाहता हूँ 


बहुत देखा सपने बंद आँखों से
अब खुले आँखों से सपने देखना चाहता हूँ 


महफ़िल में बहुत रहा अकेला
अब अकेले में महफ़िल बनाना चाहता हूँ 


दिल में बहुत सुर  है साज के लिए
उन सुरों को संगीत बनाना चाहता हूँ 


अपनों ने बहुत रुलाया  मुझे
अब उनकों मै हँसाना चाहता हूँ 


कुछ   लिखने का मन किया बैठ गया लिखने
क्यूंकि सच्चे शब्दों में सच का अहसास लिखना चाहते हैं ............






Wednesday, 5 September 2012

दहशत



















हर पल मरता हूँ जीता हूँ

हर दिन गम पीता हूँ
मै तेरे काबिल नही था या तू 
यु ही बोला करती थी कि तू नही थी 
जब दूर गये तो सोचकर आँख भर आये
क्या कसूर था तेरा जो हम कर गये
नम निगाह देख के हमदर्दी ना जाता
ये तो मैं चश्म का भोझ गिरा आया हूँ
मैं वहां की घांस भी जला आया था
तेरे जाने के बाद भी तुझे छोड़ ना पाया हूँ
अब क्या पता मेरा खुशी के पल जाने कब आयेंगे
अब खुशी तभी आएगी जब हमेशा के लिय चले जाएँगे     


Anuj Singh

Sunday, 19 August 2012

यादों के सहारे















ज़रा सी बात थी हम कह न पाए
हर इक उम्मीद लावारिस पडी है’
डर लगता है अपने यादों के दिए जलाने में
इस तूफानी रात में कही वो भी ना बुझ जाएं
तेरी अक्स ही दिखती है मुझे चारों तरफ़,
आवाज तेरी ही मुझको सुनाई देती हैं।
देख लेना वो वक्त भी आयेगा,
तुमको अपनो कि आशियाना डराएगा।
तन्हा महफिल में छोड़ सवाल कई,
वो किसी दिन दूर कहीं जां  सीमाओं से
घने अंधेरों में खो जाएगा.....

Friday, 20 July 2012

मैं कहाँ, मंजिल कहाँ
















मंजिल का पता नहीं और रुकने की आदत नही.....
कैसे कहे , किससे कहे, इस दिल की पीड़ा
बहते अश्क, मेरा रोके कदम हर मोड़ पर
हसते हैं लोग अब तो मुझे देख कर
दिल से  मजबूर क्या करें बेचारा
सोचता  था जीत गया पर हर् कदम पर हारा 
जितने की आदत थी, वो आदत पुरानी हो चुकी 
हर सपने टूट के चकनाचूर हो गये 
तन्हाई का आलम ऐसा है कि 
कभी कभी तो लग रहा है कि साँस भी साथ छोड़ जाएगी 
इस आवारा गलियों में केवल शरारती कुत्ते रहते है 
जो भौंक कर तन्हाई को दूर करना चाहते हैं 
अब तो खामोशियाँ भी चिल्ला चिल्ला कर  बोल रही है 
पता नही ये खामोशियाँ भी कब खामोश हो जाए ?????

Wednesday, 6 July 2011

तुझको भी याद आऊँ न मैं

ये चाहती है हवा उसको आजमाऊँ न मैं
कोई चिराग़ कहीं भी कभी जलाऊँ न मैं

सुकूत साया रहे इस ज़मीन पर हरदम
कोई सदा कोई फ़रियात लब पे लाऊँ न मैं

यूँ ही भटकता रहूँ उम्र भर उदास-उदास
सुराग़ बिछड़े हुओं का कहीं भी पाऊँ न मैं

सफ़र ये मेरा किसी तौर मुख़्तसर१ हो जाए
वो मोड़ आये कि जी चाहे आगे जाऊँ न मैं

भुला तो दूँ तेरे कहने पे तुझको दिल से मैं
मगर ये शर्त है, तुझको भी याद आऊँ न मैं

Thursday, 30 June 2011

ग़मों की परछाइयाँ

कभी नही छोड़ेंगे तेरा दामन तू कितना भी जोर लगा ले
जो खुदा ने भेजा है मुझे तेरे लिए ....
तू कहाँ है अभी तक...
सो रहा है या स्वप्न देख रहा है
जग देख सुबह हो चुकी है
कब तक स्वप्न में रहेगा 
जागेगा तो मै तेरे साथ रहूँगा 
तेरे तक़दीर की तस्वीर हूँ मै
मत हँस, क्योंकि लोग तुझे ढोंगी बोलेंगे 
आखिर कब तक ढोंग करेगा 
मुझे पता है तुम अँधेरे से डरते हो
और उजालों में मै तेरे साथ हूँ 
तुम किसी दरीचे से भाग
तेरे हर सफहों पे मेरा नाम है
तेरे जिन्दगी की किताब है तन्हा
जरा धीरे पढ़ 
क्योकि कुछ अनपढ़े सफहों की 
बड़ी आफत होती है..
चल जग अब बहुत हो चूका.
सिख ले मेरे साथ जीना..??????
ग़मों की परछाइयाँ

Wednesday, 3 November 2010

नेता जी

इस देश का यारो क्या कहना, हर नेता यहाँ निराला है, 
बाहर से देशभक्ति है, अन्दर से हवाला है....
कहते कुछ है , करते कुछ और है,
अब तो कुछ भी सही नही होने वाला है...