Friday, 20 July 2012

मैं कहाँ, मंजिल कहाँ
















मंजिल का पता नहीं और रुकने की आदत नही.....
कैसे कहे , किससे कहे, इस दिल की पीड़ा
बहते अश्क, मेरा रोके कदम हर मोड़ पर
हसते हैं लोग अब तो मुझे देख कर
दिल से  मजबूर क्या करें बेचारा
सोचता  था जीत गया पर हर् कदम पर हारा 
जितने की आदत थी, वो आदत पुरानी हो चुकी 
हर सपने टूट के चकनाचूर हो गये 
तन्हाई का आलम ऐसा है कि 
कभी कभी तो लग रहा है कि साँस भी साथ छोड़ जाएगी 
इस आवारा गलियों में केवल शरारती कुत्ते रहते है 
जो भौंक कर तन्हाई को दूर करना चाहते हैं 
अब तो खामोशियाँ भी चिल्ला चिल्ला कर  बोल रही है 
पता नही ये खामोशियाँ भी कब खामोश हो जाए ?????