Sunday, 19 August 2012

यादों के सहारे















ज़रा सी बात थी हम कह न पाए
हर इक उम्मीद लावारिस पडी है’
डर लगता है अपने यादों के दिए जलाने में
इस तूफानी रात में कही वो भी ना बुझ जाएं
तेरी अक्स ही दिखती है मुझे चारों तरफ़,
आवाज तेरी ही मुझको सुनाई देती हैं।
देख लेना वो वक्त भी आयेगा,
तुमको अपनो कि आशियाना डराएगा।
तन्हा महफिल में छोड़ सवाल कई,
वो किसी दिन दूर कहीं जां  सीमाओं से
घने अंधेरों में खो जाएगा.....