ये चाहती है हवा उसको आजमाऊँ न मैंकोई चिराग़ कहीं भी कभी जलाऊँ न मैं
सुकूत साया रहे इस ज़मीन पर हरदम
कोई सदा कोई फ़रियात लब पे लाऊँ न मैं
यूँ ही भटकता रहूँ उम्र भर उदास-उदास
सुराग़ बिछड़े हुओं का कहीं भी पाऊँ न मैं
सफ़र ये मेरा किसी तौर मुख़्तसर१ हो जाए
वो मोड़ आये कि जी चाहे आगे जाऊँ न मैं
भुला तो दूँ तेरे कहने पे तुझको दिल से मैं
मगर ये शर्त है, तुझको भी याद आऊँ न मैं
