Wednesday, 5 September 2012

दहशत



















हर पल मरता हूँ जीता हूँ

हर दिन गम पीता हूँ
मै तेरे काबिल नही था या तू 
यु ही बोला करती थी कि तू नही थी 
जब दूर गये तो सोचकर आँख भर आये
क्या कसूर था तेरा जो हम कर गये
नम निगाह देख के हमदर्दी ना जाता
ये तो मैं चश्म का भोझ गिरा आया हूँ
मैं वहां की घांस भी जला आया था
तेरे जाने के बाद भी तुझे छोड़ ना पाया हूँ
अब क्या पता मेरा खुशी के पल जाने कब आयेंगे
अब खुशी तभी आएगी जब हमेशा के लिय चले जाएँगे     


Anuj Singh

Sunday, 19 August 2012

यादों के सहारे















ज़रा सी बात थी हम कह न पाए
हर इक उम्मीद लावारिस पडी है’
डर लगता है अपने यादों के दिए जलाने में
इस तूफानी रात में कही वो भी ना बुझ जाएं
तेरी अक्स ही दिखती है मुझे चारों तरफ़,
आवाज तेरी ही मुझको सुनाई देती हैं।
देख लेना वो वक्त भी आयेगा,
तुमको अपनो कि आशियाना डराएगा।
तन्हा महफिल में छोड़ सवाल कई,
वो किसी दिन दूर कहीं जां  सीमाओं से
घने अंधेरों में खो जाएगा.....

Friday, 20 July 2012

मैं कहाँ, मंजिल कहाँ
















मंजिल का पता नहीं और रुकने की आदत नही.....
कैसे कहे , किससे कहे, इस दिल की पीड़ा
बहते अश्क, मेरा रोके कदम हर मोड़ पर
हसते हैं लोग अब तो मुझे देख कर
दिल से  मजबूर क्या करें बेचारा
सोचता  था जीत गया पर हर् कदम पर हारा 
जितने की आदत थी, वो आदत पुरानी हो चुकी 
हर सपने टूट के चकनाचूर हो गये 
तन्हाई का आलम ऐसा है कि 
कभी कभी तो लग रहा है कि साँस भी साथ छोड़ जाएगी 
इस आवारा गलियों में केवल शरारती कुत्ते रहते है 
जो भौंक कर तन्हाई को दूर करना चाहते हैं 
अब तो खामोशियाँ भी चिल्ला चिल्ला कर  बोल रही है 
पता नही ये खामोशियाँ भी कब खामोश हो जाए ?????