
हर पल मरता हूँ जीता हूँ
हर दिन गम पीता हूँ
मै तेरे काबिल नही था या तू
यु ही बोला करती थी कि तू नही थी
जब दूर गये तो सोचकर आँख भर आये
क्या कसूर था तेरा जो हम कर गये
नम निगाह देख के हमदर्दी ना जाता
ये तो मैं चश्म का भोझ गिरा आया हूँ
मैं वहां की घांस भी जला आया था
तेरे जाने के बाद भी तुझे छोड़ ना पाया हूँ
अब क्या पता मेरा खुशी के पल जाने कब आयेंगे
अब खुशी तभी आएगी जब हमेशा के लिय चले जाएँगे
Anuj Singh
ज़रा सी बात थी हम कह न पाए
हर इक उम्मीद लावारिस पडी है’
डर लगता है अपने यादों के दिए जलाने में
इस तूफानी रात में कही वो भी ना बुझ जाएं
तेरी अक्स ही दिखती है मुझे चारों तरफ़,
आवाज तेरी ही मुझको सुनाई देती हैं।
देख लेना वो वक्त भी आयेगा,
तुमको अपनो कि आशियाना डराएगा।
तन्हा महफिल में छोड़ सवाल कई,
वो किसी दिन दूर कहीं जां सीमाओं से
घने अंधेरों में खो जाएगा.....

मंजिल का पता नहीं और रुकने की आदत नही.....
कैसे कहे , किससे कहे, इस दिल की पीड़ा
बहते अश्क, मेरा रोके कदम हर मोड़ पर
हसते हैं लोग अब तो मुझे देख कर
दिल से मजबूर क्या करें बेचारा
सोचता था जीत गया पर हर् कदम पर हारा
जितने की आदत थी, वो आदत पुरानी हो चुकी
हर सपने टूट के चकनाचूर हो गये
तन्हाई का आलम ऐसा है कि
कभी कभी तो लग रहा है कि साँस भी साथ छोड़ जाएगी
इस आवारा गलियों में केवल शरारती कुत्ते रहते है
जो भौंक कर तन्हाई को दूर करना चाहते हैं
अब तो खामोशियाँ भी चिल्ला चिल्ला कर बोल रही है
पता नही ये खामोशियाँ भी कब खामोश हो जाए ?????