इस देश का यारो क्या कहना, हर नेता यहाँ निराला है,
बाहर से देशभक्ति है, अन्दर से हवाला है....
कहते कुछ है , करते कुछ और है,
अब तो कुछ भी सही नही होने वाला है...
Wednesday, 3 November 2010
Saturday, 29 May 2010
नक्सलवाद या आंतकवाद.... कौन अपना है कौन पराया ??
ये बात बड़ी ही सोचनीय है की हम अपना किसको कहते है ? जो हमारे हित के बारे में सोचता है उसको या फिर जो हमारा अहित करता है उसको.. अब तो बड़ा कठिन और जटिल प्रश्न हो गया है . फिर भी इस बारे में मंथन तो करना ही चाहिए. लेकिन फायदा क्या होगा हमारे लिखने से. अगर मै इस बारे में कुछ लिख भी दू तो क्या मेरी परिभाषा सर्वमान्य होगी ? कभी नही क्योकि हमसे भी बड़े- बड़े लोग इसको अच्छे तरह से परिभाषित कर चुके है. तो फिर मेरी विसात क्या की मै गलत ठहरा दूँ ! भाई जो भी हो अब ये जो बुदिमान लोग है इनके ऊपर दया आ रही है. आखिर किस शब्दकोष में ये अपना-पराया का परिभाषा पढ़े है. जो रोज किसी न किसी बहाने अपनों का खून बहते है उसे बोलते है ये लोग अपना है. अरे एक माँ को भी जब लगता है की मेरा बेटा किसी गलत काम में लग गया है तो उसे बेटा मानने से इंकार कर देती है जो की नौ महीने तक अपने कोख में पलती है. और ये तो वैसे भी किसी माँ के बेटे नही है.. क्योकि कोई माँ अपने बेटे को ये नही कह सकती जाओ और किसी निर्दोष लोगो को मारो.. ये लोग गरीब लोगो की दुहाई देते है ..अरे मै पूछता हु की जो सिपाही है, जो सैनिक है क्या वो किसी उधोगपति या किसी नेता के बेटे होते है . वो भी किसी गरीब के ही बेटे होते है.. आसे लोगो को अपना कह रहे है... शर्म आनी चाहिए जो इनकी कामो की वकालत करते है. हमें तो ऐसे लोगो को भारतीय होने पर भी शक है. जो लाखो भारतीयों को मार चुके हो उनको ये लोग अपना कहते है. आये दिन ये कुछ न कुछ नष्ट कर रहे है और ये अपना कह रहे है.. सरकार काम कर रही है लेकिन ये काम होने नही दे रहे है.. फिर भी ये अपने है.. विधालय को नष्ट कर दे रहे है फिर भी ये अपने है. वाह रे अपने....
अब सवाल ये है की पराये कौन है...आंतकवादी पराये है.. लेकिन किस आधार आप इनको पराया कह रहे है भाई.. सबके लिय बराबर मानक होना चाहिए..ये भी वही काम करते है जो आपके अपने करते है फिर ये पराये क्यों ? इनको भी वही इज्जत मिलनी चाहिए जो आपके आपनो को मिल रही है.. आखिर ये लोग भी तो अपने देश की ही लोग है...हाय रे विधाता तरस आती इनके विढ़ता पर जो अपने थोड़े से हित के लिय पुरे समाज को नष्ट कने पर तुले हुए है..
अभी भी समय है आप संभल जाओ वरना...........
जय हिंद जय भारत अनुज राठोर
अब सवाल ये है की पराये कौन है...आंतकवादी पराये है.. लेकिन किस आधार आप इनको पराया कह रहे है भाई.. सबके लिय बराबर मानक होना चाहिए..ये भी वही काम करते है जो आपके अपने करते है फिर ये पराये क्यों ? इनको भी वही इज्जत मिलनी चाहिए जो आपके आपनो को मिल रही है.. आखिर ये लोग भी तो अपने देश की ही लोग है...हाय रे विधाता तरस आती इनके विढ़ता पर जो अपने थोड़े से हित के लिय पुरे समाज को नष्ट कने पर तुले हुए है..
अभी भी समय है आप संभल जाओ वरना...........
जय हिंद जय भारत अनुज राठोर
Tuesday, 23 February 2010
मेरी सुन्दर प्रेमिका
वह मुझे बहुत ही शिद्धत से करती है प्यार,
मै चाहकर भी नही कर सकता इंकार !
उसकी दीवानगी है इस कदर मगरूर ,
मेरा क्या, इस ज़माने का भी नही कसूर !
छीन कर ले जाएगी इस मगरूर ज़माने से ,
कोई नही बचा पायेगा उसके मुहब्बत के अफसाने से !
एक दिन वो मुझे अपने बाहों में सुलाएगी ,
फिर चाह कर भी किसी की याद नही आएगी !
मैंने नही देखा उसे, वो कैसी है,
लेकिन वो अच्छी होगी, चाहे वो जैसी है !
क्या कहूँ , उस खुशनुमा पल का मुझे भी है इंतजार ,
ना जाने कब तक करेगी मुझे बेक़रार !
जब आएगी मुझे लेने, जाना होगा जरुरी ,
फिर इस दुनिया से, कभी नही मिट पायेगी दुरी !
आप जानना चाहते है कौन है मेरी पत्नी की सौत ,
वह है मेरी सुन्दर प्रेमिका, मेरी मौत !
मै चाहकर भी नही कर सकता इंकार !
उसकी दीवानगी है इस कदर मगरूर ,
मेरा क्या, इस ज़माने का भी नही कसूर !
छीन कर ले जाएगी इस मगरूर ज़माने से ,
कोई नही बचा पायेगा उसके मुहब्बत के अफसाने से !
एक दिन वो मुझे अपने बाहों में सुलाएगी ,
फिर चाह कर भी किसी की याद नही आएगी !
मैंने नही देखा उसे, वो कैसी है,
लेकिन वो अच्छी होगी, चाहे वो जैसी है !
क्या कहूँ , उस खुशनुमा पल का मुझे भी है इंतजार ,
ना जाने कब तक करेगी मुझे बेक़रार !
जब आएगी मुझे लेने, जाना होगा जरुरी ,
फिर इस दुनिया से, कभी नही मिट पायेगी दुरी !
आप जानना चाहते है कौन है मेरी पत्नी की सौत ,
वह है मेरी सुन्दर प्रेमिका, मेरी मौत !
Wednesday, 10 February 2010
ये है मुंबई मेरी जान
जय बाल ठाकरे जय महाराष्ट्रा ! अब अगर महाराष्ट्रा में रहना है तो यही कहना है. कभी मुंबई को भारत की आर्थिक राजधानी कही जाती थी ( अभी भी है ) लेकिन अब तो शिव सेना और मनसे का राजनीति का अखाडा बना हुआ है. वहा से भारत का कोई नाता नही है. वहा पर कानून भी बाउरा (बाल ठाकरे, उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ) का चलता है. अगर कोई मैच करना हो तो शिव सेना से परमिशन लिजिय, अगर कोई मूवी का रिलीज सही ढंग से चाहते हो तो बाउरा से मिलिए. यानि मुंबई में कुछ भी करना हो तो बाउरा से मिलिए. ये है क्या ? बाउरा की दादागिरी. जी हा आप अगर मुंबई में जाना चाहते हो तो पहले इन साहब से मिल कर अपना वीजा बनवा लीजिये नही तो हो सकता है की आपको मुंबई से निकाल दिए जाये. और यही वहा की लोकतंत्र है. इसमें मराठा भाई का कोई कसूर नही है. कसूर तो यु. पि. और बिहार के लोगो का भी नहीं है. हमारे बाउरा साहब का भी नही है. सभी अपना हित चाहते है वो भी अपना हित चाह रहे है. तो सवाल है की कसूर किसका है ? ये सब कसूर उस मुंबई का है. जो सदियों पहले भारत की आर्थिक राजधानी बन गयी . अब आर्थिक राजधानी तो पुरे देश की है तो अर्थ के लिय तो लोग जायेंगे ही. इसमे कसूर तो किसी का नही है भाई. अब सवाल है की मुंबई अगर भारत का है तो भारत को कुछ करना चाहिए लेकिन भारत भी तो अपना हित देख रहा है. उसे भी तो बाउरा जैसे अपने हित की पूर्ति करनी है. करे भी क्यों नही आखिर ऐसे मौके बार बार तो आते नहीं जब दो दुश्मन आपस में ही लड़ रहे हो तो क्या जरूरत है बिच में पड़ने की.हाय रे भारत तरस आती है ऐसी घिनौनी राजनीति पर. अगर भारत के प्रतिनिधि राहुल गाँधी को जाना हो तो कानून ऐसे हो जाती है जैसे पूरा मुंबई कर्फुयु जैसा माहौल और वही आम आदमी के लिय कानून सोते रहता है. जब कोई परीक्षा होती है तो वहा की सरकार को पता रहता है की बाहर से लोग आयेंगे तब इन बाउरा के गुंडों को रोकने के लिय कोई पुलिस नही, कोई फ़ोर्स नहीं सब सो रहे होते है लेकिन कोई कोंग्रेस का नेता जाता है तो सब कुछ सही हो जाता है. शाहरुख़, अमिताभ, सचिन, ये सब जब धमकाए गये तो कानून सुधार की कोई जरूरत नही समझी गयी लेकिन अपने नेता को धमकाया गया तो वहा के C M ने केंद्र सरकार से तुरंत कानून सुधार की बात कहने लगे.
आखिर ये कब तक चलते रहेगा. जब वो सत्ता में रहे तो इनको निशाना बनाया जब ये सत्ता में है तो उनको निशाना बनाया. लेकिन आम जनता तो हमेशा निशाना बनती है. चाहे वो हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर या उत्तर भारत-दखिन भारत के नाम पर या सवर्ण-दलित के नाम पर. इस तरह की राजनीति करने वाले लोग कब तक इस देश को कमजोर करते रहेंगे.
इन लोगो का बस एक ही हस्र होना चाहिए......... इनको फाँसी होनी चाहिए. जब एक आतंकवादी को फाँसी हो सकती है तो इनको क्यों नही. जो काम आतंकवादी कर रहे है वही काम तो ये लोग भी कर रहे है. . आतंकवादी से भी जायदा खतरनाक है ये लोग ! कम से कम आतंकवादी को हम समझ सकते है, पहचान सकते है लेकिन इनको तो पहचान भी नही सकते. ये तो घर अन्दर बैठ कर हम लोगो से ही अपने लोगो का खून करवारते है. और हम करते भी है. हमको पता भी नही चलता है. हम इतने भावनाओ में बह जाते है की अपना पराया भी समझ में नही आता. तो सबसे पहले इनसे निपटना होगा नही तो हम आपस में लड़ेंगे ये लोग शान से बैठ कर तमाशा देखेगे. आप सभी लोग इस चीज को समझ जाओ वरना ?????????????????????????
जय हिंद जय भारत
अनुज राठौर
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